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रविवार, 17 मार्च 2019

वीरागढ़ साम्राज्य A motivational story in Hindi with moral about an Empire

वीरागढ़ साम्राज्य A motivational story in Hindi with moral about an Empire

Story of Veeragarh

story in hindi 

एक ऎसा साम्राज्य था जिसके नाम मात्र से शत्रुओं के दिल में खौफ के नगाड़े बजने लगते थे,यदि युद्ध में यह साम्राज्य जिसके साथ होता था तो उसकी विजय भी निश्चित थी, वीरागढ के राजा माधो प्रताप थे जिनका एक बेटा वीरा था माधो चाहते थे कि उनका बेटा भी एक महान राजा होने के साथ साथ एक कुशल योद्धा भी हो जिसके एक ललकार से शत्रु पक्ष के कदम हिल जाए और उनके दिलों की धड़कन जोरों से डर के मारे धड़कने लगे,और ये जनता पर हुकूमत ने करे बल्कि ये उनके दिलों पर राज करने वाला राजा भी बने,यही सोच कर राजा ने अपने सबसे कुशल अंगरक्षक मांडव को वीरा के देख रेख़ तथा उसके व्यक्तित्व को निखारने का ज़िम्मा सौंप दिया,मांडव एक अनुशाशी एवं अपने नियम का पालन करने वाला था,वह राजा से आज्ञा लेता है कि वह वीरा को अपने तरीके से शिक्षा देगा राजा को मंजूर था,मांडव वीरा को शिक्षा देने लगा वीरा अभी १२ वर्ष का था.....

कहते हैं ना जितनी ज्यादा आप उपलब्धि पाएंगे उनसे कहीं ज्यादा आपके शत्रु भी बढ़ते जाते है,ऎसे ही माधोगढ़ कइयों के मन में खटकता था,पर उनके बस की भी तो नहीं थी कि इस सम्राज्य पर आंख भी उठाए,इसे में वो करे भी तो क्या?

पर एक पड़ोसी राजा इंद्रजीत की चाल काम कर जाती है उसने अपने एक सबसे होनहार,छली, कपट,चापलूस योद्धा (विक्रम) को माधो के सेना में प्रवेश करने की योजना बनाता है,और अपनी सारी योजना विक्रम को समझाकर भेजता है,,

सुबह का समय था माधो का दरबार लगा था राज्य के हित की बातें हो रहीं थीं तभी वहां एक योद्धा की तरह दिखने वाला जिसके कमर में चमचमाती तलवार बंधी थी पीठ पे ढाल थी वो कोई और नहीं विक्रम था,उसने राजा का विनम्र आवाज में जय जयकार किया,,,

माधो पूछते हैं- हे वीर कौन हो तुम,कहा से आए हो और          तुम्हारा उद्देश्य क्या है आने का.....???
विक्रम कहता है- मेरा नाम विक्रम है मै जंगल में रहता हूं मेरा    कोई नहीं है मै हमेशा से इस राज्य के सेना में शामिल होना चाहता था पर खुद को काबिल नहीं समझता था पर अब मुझे विश्वास है कि मै आपकी सेवा अच्छी तरीके से कर सकता हूं यदि आप मुझे अवसर दें तो,?

माधो का सेनापति बोलता है हम तुमपे विश्वास क्यों करे? तो विक्रम कहता है कि जनाब आप मेरी कोई भी परीक्षा ले सकते है यदि मै पीछे हटा तो मेरा सर काटने में देर मत करिएगा येसा उसका विश्वास देख सब अचंभित रहते है,तो ठहरा छली कपटी,उसने कुछ अपना प्रदर्शन दिखाया उसका प्रदर्शन सच में सराहनीय था,राजा ने उसको एक अच्छा सा पद दे दिया,विक्रम सेना में शामिल हो जाता है,किसी को भी ये खबर नहीं थी कि राजा का यह निर्णय माधोगढ़ में तबाही ला देगा और राजा भी तो अनभिज्ञ थे आने वाले भयंकर परिणाम से........

उधर मांडव वीरा के प्रशिक्षण को दिन प्रति दिन कठोर एव निखरता जा रहा था,उसी भांति वीरा की निपुड़ता भी बढ़ रही थी,मांडव की सिखाने की शैली बहुत ही कठोर थी वीरा एक राजकुमार था पर वो राजशाही भोजन से वंछीत रहता था सिर्फ उबले सब्जियां,फल,कठोर अनाज ही खाने पड़ते थे जो उसकी स्फूर्ति एवं ताक़त के लिए जरूरी थे,उसका ज्यादा समय प्रशिक्षण में ही लगता था,मांडव उसे तलवार चलना,भला फेकना,धनुर विद्या, सामाजिक व्यक्तिव,इत्यादि  सभी ज्ञान बताता था....



इधर विक्रम राजा के मन में अपने विश्वास को मजबूत बना रहा था,वो राजा के कई उलझनों को सुलझाता और समय समय पर अपना सुझाव भी देता था जिसकी वजह से वो राजा का चहिता बन जाता है,पर सेनापति को विक्रम पर संदेह होता था वो राजा से बोलता था महाराज आप इससे सावधान रहा करिए क्यूंकि-
कहा जाता है जब कोई आपके प्रति एकाएक अपने व्यवहार बदल ले,या एक से ज्यादा संभावनाएं एक साथ घटित होने लगे तो सतर्क हो जाना चाहिए।
पर राजा उसकी बात को अनसुना कर बोलते थे अरे ऐसा कुछ भी नहीं है विक्रम एक ईमानदार सैनिक है तुम फालतू की बातों पर दिमाग मत लगाया करो,,

विक्रम को ये खबर थी कि सेनापति उसपर निगरानी करता है कुछ करना पड़ेगा इसको रास्ते से हटाने के लिए,वो सेनापति को फसाने के लिए योजना बनाने लगता है,,,
एक शाम की बात है जब सेनापति अकेले युद्ध अभ्यास कर रहा होता है तो चुपके से विक्रम ने उसके राज चिन्ह वाली तलवार को चुरा लेता है,और कहा जहां पे दरबार लगता था वहां पहुंचता है,और राज गद्दी के ठीक ऊपर तलवार को इस प्रकार व्यवस्थित करता है कि यदि राजा जैसे ही गद्दी पे बैठे वैसे ही तलवार गिरे और राजा आहत हो जाए..…...
उधर सेनापति अपनी तलवार ना पाकर व्याकुल हो जाता है उसे चिंता हो जाती है कि वो मेरा राजशाही तलवार थी कोई उसका गलत उपयोग ना कर ले..



अगली सुबह दरबार लगता है पर अभी तक राजा और सेनापति नहीं आए थे,किन्तु कुछ ही समय में राजा आ जाते हैं जैसे ही वो राजसिंहासन पे बैठते हैं ऊपर लगी तलवार आकर उनके पैर में चुभ जाती है, तुरंत सारे सैनिक उनके पास दौड़ते हैं,तुरंत विक्रम बोलता है महाराज सम्हालिए खुद को वो राजा के पास जाता है,तुरंत बोलता है ये तो सेनापति जी की राजशाही तलवार है लेकिन वो आपको क्यों मारना चाहते है,विक्रम ने काफी भड़काया राजा को और दरबारियों के सामने सेनापति के बारे में काफी बुरा भाला कहा,राजा काफी गुस्से में थे,उनका शंका और बढ़ गई जब उन्होंने देखा कि सेनापति वहां है भी नहीं,विक्रम राजा के उपचार की व्यवस्था करता है,राजा गुस्से में बोलते हैं कि सेनापति को तुरंत बुलाया बुलाओ,विक्रम जाता है और उधर ही रुक जाता है सेनापति को खोजता भी नहीं वापस आकर बोलता है महाराज लगता है सेनापति को खबर हो गई की आप बच गए है इसी लिए वो भाग गया वो राजा को काफी चढ़ा देता है......

उधर सेनापति को जैसे ही ये खबर मिलती है वो भगा भगा राजा के पास आता है रास्ते में उस सब अजीब निग़ाहों से देख रहे थे,जैसे ही वो राजा के पास आता है सैनिक उस रोक पकड़ लेते हैं राजा भी उस देख इतना गुस्सा होते हैं कि उसके बोलने से पहले ही सिपाहियों को आदेश दे देते है की इस कैदखाने में डाल दो ये राजद्रोह किया है उसकी राजा ने एक बात तक नहीं सुनी क्यूंकि राजा की बुद्धि विक्रम ने पूरी तरह सुन्न कर दी थी, सेनापति खैदखाने में बंद हो जाता है....
विक्रम को ये सब इतना आसान नहीं लग रहा था पर अब तो उसके रास्ते का कंटक भी हट चुका था और उसे राजा ने अपना सेनापति भी घोषित कर दिया..........

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धीरे धीरे दिन बीतता गया विक्रम इंद्रजीत को सारी सूचनाएं देता रहा और चोरी छुपके माधो के खजाने भी इंद्रजीत तक पहुंचवाने लगा,उसने अपने चपलुस्ता से कुछ अपने विस्वस्थनिय सैनिक बना लिए थे जो उसके लिए मरने मारने को तैयार थें,वो प्रजा के बीच छोटे छोटे विद्रोह करवाने लगा,माधो को चिंता होने लगी कि ये क्या हो रहा है उसके शाशन में उसको कोई खबर नहीं थी,,,एक दिन राजा ने सबको दरबार में बुलाया खबर मांडव तक भी पहुंचाई गई मांडव राजदरबार के लिए तैयार होता है तो वीरा बोलता है गुरु जी मै भी दरबार में जाना चाहता हूं, वीरा अब एक कुशल योद्धा बन चुका था उसकी तलवार चलती थी तो उसके करीब के शत्रु के प्राण निकाल के ही रुकती उसकी गति हवा थी,उसकी आवाज भारी कद लंबा था,वो भी दरबार के लिए निकल पड़ता है वो दरबार पहुंचते हैं अपने बेटे को देख राजा बेहद खुश होता है,,,
सभा शुरू होती है राजा बोलते है कि ना जाने राज्य में क्या हो रहा है लोगो में विद्रोह, राजकोष में कमी ये सब राज्य के लिए बेहद खराब है आप लोग अपने सुझाव प्रस्तुत करिए..??
सब लोग अपने अपने सुझाव देते हैं सबसे अंतिम में वीरा खड़ा होता है..

वीरा बोलता है- महाराज ये बिल्कुल चिंता जनक बात है  राज्य में विद्रोह हो रहे है और राजकोष से खजाने कम हो रहे है ऐसा लगता है जैसे कोई राज्य को समाप्त करना चाह रहा है,,अब ये दो लोग ही हो सकते है या तो बाहर के या फिर अन्दर के,रही बात बाहर वालों की तो इस राज्य की तरफ देखने की भी हिम्मत नहीं है, हां हो सकता है कि कोई अन्दर का आदमी हो जो हमारे बीच रह कर ये खेल रच रहा हो...??? राजा सोच में पड़ जाता है वीरा भी अब वही रुक जाता है कुछ समय बीतता है उधर इंद्रजीत अपने आस पास के राजाओं से सहायता लेता है और काफी बड़ी सेना तैयार कर लेता है विक्रम के योजना के अनुसार वो एक दिन माधो को युद्ध के लिए ललकारता है पत्र भेजकर,,,,

अगले दिन माधो युद्ध के लिए तैयार होते हैं वीरा बोलता है पिता श्री मै भी युद्ध में चलूंगा यह सुन विक्रम के होश उड़ जाते है क्यूंकि उसे पता था कि यदि वीरा युद्धभूमि में जाता है तो इनकी जीत पक्की है,उसने तुरंत बोला बेटा तुम्हारी वहां क्या जरूरत हम सब हैं ना महाराज के सहायता के लिए और वैसे भी उस इंद्रजीत से लडने के लिए इतने योद्धा की जरूरत ही नहीं पड़ेगी आप यहां रुकिए और प्रजा की देख रेख़ करिए,पर राजा चाहते थे कि वीरा उनके साथ चले उन्होंने बोला की अच्छा चलो तुम भी हमारे साथ जरा हम भी अपने बेटे का युद्ध कौशल तो देखें.....

यह सुन विक्रम के होश उड़ जाते है वो सोचता है वीरा को कैसे रोके उसने अपने कुछ सैनिकों को बुलाया और बोला कि तुम लोग राज्य में जाओ और भगदड़ मचा दो और आग लगा देना उसके कहे अनुसार सैनिक राज्य में वैसा ही करते हैं,राजा तक यह खबर आती है राजा युद्ध के लिए निकलने वाले थे तुरंत विक्रम ने बोला महाराज ये इस साम्राज्य की सम्मान कि बात है युद्धभूमि में शत्रु ललकार रहा है हमे वहां पहुंचना चाहिए,और यह विद्रोह हमारे राज्य में है जिसे हमारे युवराज वीरा आसानी से सम्हाल लेंगे,राजा ने ये निर्णय ठीक समझा उन्होंने वीरा को भगदड़ रोकने के लिए भेज दिया और विक्रम के साथ सेना लेकर चल दिए,विक्रम ने सेना में अपने आदमी ज्यादा रखे थे और राजा को यह सांत्वना दिया था कि इंद्रजीत के लिए बहुत बड़ी सेना ले जाने की जरूरत नहीं है महराज...

युद्धभूमि में पहुंचते हैं जब माधो ने इतनी बड़ी सेना देखी इंद्रजीत की,तो विक्रम से कहा ये तो काफी बड़ी सेना है विक्रम हसते हुए बोलता है बहुत बड़े सम्राट बन रहे थे ना सबसे बेवकूफ सम्राट हो तुम,जितनी भी तुम्हारे राज्य में घटनाएं हुई उन सबको मैंने करवाया था,तुम्हारे सेना पति को बंद करवाया सब कुछ मेरा किया धरा था यह कह कर उसने अपने सारे सैनिकों को अपनी तरफ बुला लिया और आक्रमण करवा दिया उनके बीच युद्ध होने लगा पर माधो के पास सेना कि कुछ ही टुकड़ी बची थी तो माधो ने एक से कहा तुम तुरंत जाकर वीरा को सारी बात बताना और बोलना मेरे साथ विश्वाघात हुआ है,वो सैनिक वाहा से बचते बचाते निकाल जाता है,माधो के सेना की संख्या कम होने की वजह से सब मारे जाते है,अंत में विक्रम ने माधो के पैरो पर तीर मार देता है और इंद्रजीत पीछे से उसके पीठ में तलवार चुभो देता है,और बोलता है तू अब सम्राट नहीं है अब में सम्राट हूं....

माधो के मुख से खून निकलने लगता है वो मुस्कुराते हुए बोलता है अरे कपटी तू क्या सम्राट बनेगा सम्राट बनने के लिए शेर दिल चाहिए,जो कि सिर्फ मेरे बेटे वीरा में है,,मै एक शेर को छोड़ के जा रहा हूं,अब तक मैंने राज किया तुम सब पर अब वो राज करेगा तुम सब पर,तुम सब हमेशा शेरों के गुलाम है रहोगे याद रखना वो एक एक  खून पिएगा.................

उधर वो सैनिक पहुंचता है और वीरा को सारी बात बता देता है-..............

कहानी का दूसरा हिस्सा जल्द आएगा.......


                            ।।धन्यवाद।।

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